दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016

 Ques 1: दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016 के अन्तर्गत  व्यक्तियो एवं व्याझेदारी फर्मो  के सम्बन्ध मे नवीन आरम्भ प्रक्रिया के महत्वपूर्ण प्रावधानो की विवेचना कीजिए। 

Ans :-दिवालिया का अर्थ 

साधारण शब्दों में,"दिवालिया से आशय ऐसे व्यक्ति से है जिसके दायित्व उसकी सम्पत्तियों से अधिक हो जाएं। लेकिन वैधानिक दृष्टि से किसी भी व्यक्ति को दिवालिया तब तक नहीं कहा जा सकता जब तक वह निम्नलिखित दो शर्तों को पूरा न करता हो। 


1. उसके दायित्व उसकी सम्पत्तियों से अधिक हो जाएं। 

2. न्यायालय द्वारा उसे दिवालिया घोषित कर दिया गया हो। 



दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016

दिवाला एवं शोधन अक्षमता सहिता को Insolvency and Bankrupcy Code 2016 नाम से भी जाना जाता है। जिसे संक्षेप मे IBC 2016 भी कहते है, जोकि 5 मई 2016 लोकसभा में पास हुआ तथा 28 मई 2016 से सम्पूर्ण भारत मे लागू होता है। 

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016 का प्रमुख उद्देश्य दीवाला संबंधी कानूनों का एकीकरण करना एवं दीवाला संबंधी प्रक्रिया को आसान बनाना है।


परिभाषायें
Definitions

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016 के अन्तर्गत दी गई प्रमुख परिभाषाये निम्नलिखित है। 


1. न्यायिक प्राधिकारी [Adjudicating Authority] 


न्यायिक प्राधिकारी से आशय ऋण वसूली आधिकारण अर्थात Debt recovery tribunal से है, जिसे संक्षेप मे D.R.T के नाम से भी जाना जाता है। 


2.देनदार के सहयोगी:- देनदार के सहयोगी के अंतर्गत निम्नलिखित व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है।

1. ऐसा व्यक्ति जो देनदार के निकटतम परिवार से है।

2. ऐसा व्यक्ति जो देनदार का रिश्तेदार है।

3. ऐसा व्यक्ति जो देनदार का साझेदार है।

4. ऐसा व्यक्ति जो देनदार का नियोक्ता (मालिक) है।


3.अपवर्जित संपत्तियाँ - अपवर्जित संपत्तियों के अंतर्गत निम्नलिखित संपत्तियों को सम्मिलित किया जाता है:

1. भारमुक्त पुस्तकें और वाहन जो दिवालिया व्यक्तियों के व्यक्तिगत उपयोग के लिए आवश्यक है।

2. भारमुक्त घरेलू उपकरण जोकि दिवालिया के मूलभूत घरेलू आवश्यकताओं के लिए आवश्यक है।

3. भारमुक्त व्यक्तिगत आभूषण

4. भारमुक्त जीवन बीमा पॉलिसी

5. भारमुक्त पेंशन


4.अंहिता प्राप्त ऋण :- अंहिता प्राप्त ऋण के अंतर्गत संविदा के अंतर्गत देय ऋणों को सम्मिलित किया जाता है, लेकिन निम्नलिखित ऋणों को सम्मिलित नहीं किया जाता है।


कोई भी अपवर्जित ऋण 

रक्षित सीमा तक ऋण। 

नवीन आरम्भ प्रक्रिया से लिए 3 महीने पहले तक के गए ऋण। 


दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016 की विशेषताएं


दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016 की विशेषताएं निम्नलिखित हैं।


1.दीवाला पेशेवर :-दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016 की पहली तथा सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके अंतर्गत दीवाला पेशेवर(insolvency professional)की नियुक्ति की जाती है जो कि दीवाला सम्बन्धी प्रक्रिया को संचालित करता है।


2.अधिकरण :-दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016 की दूसरी तथा सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है इसके अंतर्गत NCLT एवं DRT के गठन का प्रावधान किया गया है।

यहां nclt से आशय national company law tribunal से है।तथा drt से आशय debt recovery tribunal से है।


3.भारतीय दीवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड :-दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016 की तीसरी तथा सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है इसके अंतर्गत भारतीय दीवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड insolvency and bankruptcy board of India के गठन का प्रावधान किया गया है।


4.व्यापक कानून:-दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016 की चौथी तथा सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है इसका क्षेत्र अत्यंत व्यापक है क्योंकि इसके अनुसार ही एक व्यक्ति ,साझेदारी फर्म तथा कंपनी की दीवाला संबंधी प्रक्रिया संचालित की जाती है।


नवीन आरंभ प्रक्रिया/ दीवाला संकल्प और समापन की प्रक्रिया

नवीन आरंभ प्रक्रिया नवीन आरंभ प्रक्रिया के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं: 


1.नवीन आरंभ प्रक्रिया हेतु आवेदन के लिए पात्रता - यह नवीन आरंभ प्रक्रिया का प्रथम चरण है। जिसके अंतर्गत ऐसा कोई भी देनदार जो कि अपने ऋणों का भुगतान करने में असक्षम है, नवीन आरंभ प्रक्रिया हेतु आवेदन दे सकता है, बशर्ते उसकी आय 60 हजार से कम तथा कुल संपत्तियाँ 20 हजार रुपये से कम हों। 


2.नवीन आरंभ प्रक्रिया हेतु आवेदन - यह नवीन आरंभ प्रक्रिया का दूसरा चरण है, जिसके अंतर्गत न्यायिक प्राधिकारी को आवेदन दिया जाता है, तथा आवेदन देते ही Interim moratorium प्रारंभ हो जाता है। 


3.पेशेवर की नियुक्ति - यह नवीन आरंभ प्रक्रिया का तीसरा चरण है, जिसके अंतर्गत I.B.B.I. द्वारा 10 दिन के भीतर एक पेशेवर की नियुक्ति की जाती है। 


4.आवेदन की जाँच :- यह नवीन आरंभ प्रक्रिया का चौथा चरण है, जिसके अंतर्गत पेशेवर द्वारा देनदार द्वारा किए गए आवेदन की जाँच की जाती है। 


5.आवेदन की स्वीकृति तथा अस्वीकृति :-यह नवीन आरंभ प्रक्रिया का पाँचवा चरण है जिसके अंतर्गत पेशेवर द्वारा देनदार द्वारा किए आवेदन की जाँच के पश्चात् उसे 14 दिन के भीतर स्वीकृत या अस्वीकृत किया जाता है। 


6.आवेदन को स्वीकार करने का प्रभाव :-यह नवीन आरंभ प्रक्रिया का छठा चरण है, जिसके अंतर्गत आवेदन को स्वीकार करते ही moratorium Period प्रारंभ हो जाता है। 


7. लेनदार द्वारा आपत्तियाँ :- यह नवीन आरम्भ प्रक्रिया का सातवा चरण है, जिसके अंतर्गत लेनदार द्वारा आपत्तियाँ दर्ज कारायी जाती है। 


8. पेशेवर के निर्णय के विरुद्ध आवेदन :- यह नवीन आरंभ प्रक्रिया का आठवां चरण है, जिसके अन्तर्गत यदि लेनदार चाहे तो पेशेवर के निर्णय के विरुद्ध न्यायिक प्राधिकारी को आवेदन कर सकता है। 


9.देनदार के कर्तव्य :-यह नवीन आरंभ प्रक्रिया का नयाँ चरण है, जिसके अंतर्गत देनदार के कुछ कर्तव्य उत्पन्न हो जाते हैं। 


Example: पेशेवर को उपलब्ध Statement of affairs कराना। 


और इसमें यदि कोई कमी है, तो उसकी सूचना पेशेवर को देना। 


10.पेशेवर का परिवर्तन: यह नवीन आरंभ प्रक्रिया का दसवाँ चरण है, जिसके अंतर्गत देनदार चाहे तो पेशेवर का परिवर्तन करा सकता है। 


11.आदेश का खण्डन: यह नवीन आरम्भ प्रक्रिया का 11वां चरण है, जिसके अंतर्गत पेशेवर के आदेश का खण्डन हेतु न्यायिक प्राधिकारी को आवेदन किया जा सकता है। 


12.मुक्ति आदेश: यह नवीन आरम्भ प्रक्रिया का 12वां चरण है जिसके अंतर्गत न्यायिक प्राधिकारी द्वारा अहिंता ऋणों की अन्तिम सूची के आधार पर मुक्ति आदेश दे दिया जाता है। 


13.आचार मानक: यह नवीन आरंभ प्रक्रिया का 13वां चरण है। जिसके अन्तर्गत पेशेवर द्वारा अपना कार्य करते समय आचार मानको का पालन किया जाता है। 









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