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Showing posts from May, 2025

Alternative strategy

 1. बाज़ार प्रवेश रणनीति (Market Penetration Strategy):- यह रणनीति केवल उन्हीं व्यापारियों द्वारा अपनाई जाती है जो पहले से किसी बाज़ार में मौजूद होती हैं और अपनी बाज़ार हिस्सेदारी बढ़ाना चाहते हैं। यदि किसी कंपनी द्वारा इस रणनीति को अपनाया जाता है तो उस दशा में वह दुकानों में अधिक डिस्काउंट देती है,प्रचार करती है, प्रतिस्पर्धियों के ग्राहकों को आकर्षित करती है । जैसे – Patanjali, HUL 2. बाज़ार विकास रणनीति (Market Development Strategy):-यह रणनीति केवल उन्हीं व्यापारियों द्वारा अपनाई जाती है जो पहले से किसी बाज़ार में मौजूद नहीं होती हैं नए बाजार में बेचना चाहते हैं। यदि किसी कंपनी द्वारा इस रणनीति को अपनाया जाता है तो उस दशा में वह शहरी उत्पाद को ग्रामीण क्षेत्रों में ले जाती है , अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में प्रवेश करने की कोशिश करती है। उदाहरण: Zomato 3. उत्पाद विकास रणनीति (Product Development Strategy):-यह रणनीति केवल उन्हीं व्यापारियों द्वारा अपनाई जाती है । जो पहले से किसी बाज़ार में मौजूद होती हैं और अपने ग्राहकों को नए उत्पाद देना चाहती हैं। यदि किसी कंपनी द्वारा इस रणनीति...

प्रतिस्पर्धी विश्लेषण

 Q.प्रतिस्पर्धी विश्लेषण से आप क्या समझते हैं ? इसकी प्रक्रिया को समझाइए। प्रतिस्पर्धी विश्लेषण का अर्थ  प्रतिस्पर्धी से आशय ऐसे व्यापारी से है जो कि हमारे ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करता है। प्रतिस्पर्धी विश्लेषण का अर्थ है अपने व्यापार के प्रतिस्पर्धीयों का गहराई से अध्ययन करना कि जो व्यापारी हमारे जैसे प्रोडक्ट या सेवाएं बेचते है वो क्या कर रहे हैं और हम उनसे बेहतर कैसे बन सकते हैं? प्रतिस्पर्धी विश्लेषण की आवश्यकता  प्रतिस्पर्धी विश्लेषण की प्रमुख आवश्यकता निम्नलिखित हैं। अर्थात् प्रतिस्पर्धी विश्लेषण की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से पड़ती है। 1. प्रतियोगिता को समझने के लिए 2. ग्राहकों की जरूरतों को समझने के लिए 3. कमजोरियाँ पहचानने के लिए 4. बेहतर रणनीति (Strategy) बनाने के लिए 5. बाजार में टिके रहने के लिए प्रतिस्पर्धी विश्लेषण की प्रक्रिया प्रतिस्पर्धी विश्लेषण की प्रक्रिया को निम्नलिखित चरणों में विभक्त किया जा सकता है 1. प्रतियोगियों की पहचान (Identification of Competitors):- यह प्रतिस्पर्धी विश्लेषण की प्रक्रिया का पहला तथा सबसे महत्वपूर्ण च...

Miscellaneous questions

 Q.Elements and Qualities of Ideal Citizenship; Obstacles in Achieving Ideal Citizenship Acquiring Citizenship The main methods of acquiring citizenship are as follows: 1.By Birth: This is the first and most important method of acquiring citizenship, under which Indian citizenship can be obtained by being born in India. 2.By Registration: This is the second and most important method of acquiring citizenship, under which Indian citizenship can be obtained by registering in India. 3.By Naturalization: This is the third and most important method of acquiring citizenship, under which Indian citizenship can be obtained by renouncing the citizenship of another country. Qualities of Ideal Citizenship The main qualities of ideal citizenship are as follows; meaning, an ideal citizen must possess the following qualities: 1.Good Education: Good education is extremely essential for an ideal citizen because a good citizen and a good nation cannot even be imagined without education. 2.Good Healt...

मुद्रा स्फीति लेखांकन

 Q.मुद्रा स्फीति लेखांकन से आप क्या समझते हैं? मुद्रा स्फीति लेखांकन के गुण व दोष बताइये। Answer:- मुद्रा स्फीति लेखांकन का अर्थ Meaning of inflation accounting  मुद्रा स्फीति लेखांकन को अंग्रेजी में inflation accounting कहते हैं। जो कि दो शब्दों से मिलकर बना है।inflation +accounting  inflation का अर्थ है मुद्रा स्फीति तथा accounting का अर्थ है लेखांकन अर्थात इस प्रकार हमें मुद्रा स्फीति लेखांकन के अर्थ को समझने से पूर्व हमें मुद्रा स्फीति तथा लेखांकन के अर्थ को पृथक पृथक समझ लेना अत्यन्त आवश्यक है। जब देश में वस्तुओं की कीमत में वृद्धि होने लगती है तथा मुद्रा की क्रय शक्ति(purchasing power) में कमी होने लगती है तो इसे मुद्रा स्फीति(inflation )कहते हैं। और जब देश में वस्तुओं की कीमत में कमी होने लगती है तथा मुद्रा की क्रय शक्ति(purchasing power) में वृद्धि होने लगती है तो इसे अवस्फीति(Deflation) कहते हैं। लेखांकन से आशय लेन-देनों को क्रमबद्ध रूप में लिखने, वर्गीकरण करने, सारांश तैयार करने एवं उनको प्रस्तुत करने से है, जिससे कि उनका विश्लेषण तथा निर्वचन किया जा सके। मुद्रा...

निगमीय वित्तीय प्रतिवेदन

 Q.निगमीय वित्तीय प्रतिवेदन का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसके प्रमुख प्रकारों का वर्णन कीजिए। निगमीय वित्तीय प्रतिवेदन के उद्देश्यों का विवेचन कीजिये। निगमीय वित्तीय प्रतिवेदन का अर्थ  निगमीय वित्तीय प्रतिवेदन को अंग्रेजी में Corporate Financial Reporting कहते है। जिसका अर्थ है, प्रबन्ध को किसी चीज की जानकारी सूचना या विवरण देना।  क्योंकि व्यवसाय से सम्बन्धित सूचनाओं को एकत्रित करने का कार्य लेखापालको (Accountants)द्वारा किया जाता है। जो कि व्यवसाय से सम्बन्धित सूचना को एकत्रित करके उच्च अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत करते है।  लेखापालको के इसी कार्य को संवहन के रूप में जाना जाता है और संवहन का यही कार्य प्रतिवेदन के द्वारा किया जाता है।  निगमीय वित्तीय प्रतिवेदन के उद्देश्य निगमीय वित्तीय प्रतिवेदन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं। 1. प्रबन्ध में सहायक :- निगमीय वित्तीय प्रतिवेदन का पहला तथा सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य प्रबन्ध में सहायता प्रदान करना होता है।  2.नियोजन में सहायक :-निगमीय वित्तीय प्रतिवेदन का दूसरा तथा सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य नियोजन में सहायता प्रदा...

अंशों का मूल्यांकन

 Q.अंशों के मूल्यांकन से आप क्या समझते हैं अंशों के मूल्यांकन की विभिन्न पद्धतियां उदाहरण सहित समझाइए। अंश का अर्थ: अंश कंपनी की पूंजी की अविभाज्य इकाई है, जिसके और छोटे टुकड़े नहीं किए जा सकते हैं, तथा जिसका प्रयोग कंपनी पूंजी प्राप्त करने के लिए करती है।  प्रत्येक अंश का एक निश्चित मूल्य होता है, जिसे अंकित मूल्य अर्थात Face value कहते हैं। अंशों के आन्तरिक मूल्य (intrinsic value)से आशय ऐसे मूल्य से है जो कि शुद्ध संपत्ति के मूल्य को अंशों की संख्या से भाग देने पर प्राप्त होता है। अंश निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं। 1.समता अंश  2.पूर्वाधिकारी अंश  सामान्यतः समता अंशों  का ही मूल्यांकन किया जाता है। अंशों के मूल्यांकन का अर्थ अंशों की मूल्यांकन से आशय से अंशों के उस मूल्य को ज्ञात करने से है जिस पर कंपनी के अंशों का क्रय -विक्रय एवं हस्तांतरण किया जाता है अंकित मूल्य की तुलना में अंशों का मूल्यांकन सामान्यतः अधिक होता है। अंशों के मूल्यांकन की आवश्यकता  अंशों के मूल्यांकन की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से पड़ती है। 1.एकीकरण पर :-कम्पनी के एकीकरण पर अंशों ...

कॉरपोरेट गवर्नेंस कोड

 Q.सेबी द्वारा विकसित कॉरपोरेट गवर्नेंस कोड की व्याख्या करें। Answer:- सेबी द्वारा कॉरपोरेट गवर्नेंस कोड विकसित करने के लिए सन 1999 में कुमार मंगलम बिरला की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया जिसने विभिन्न सुझाव दिए और इन्हीं सुझावों को ध्यान में रखते हुए सेबी द्वारा कॉरपोरेट गवर्नेंस कोड विकसित किया गया । कॉरपोरेट गवर्नेंस कोड की प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं। 1.संचालक मंडल(board of directors):- यदि अध्यक्ष स्वतंत्र है, तो बोर्ड में कम से कम 1/3 स्वतंत्र निदेशक होने चाहिए। यदि अध्यक्ष स्वतंत्र नहीं है, तो बोर्ड में कम से कम 50% स्वतंत्र निदेशक होने चाहिए। बोर्ड में कम से कम एक महिला निदेशक का होना अनिवार्य है। 2.अंकेक्षण समिति(Audit committee):- अंकेक्षण समिति का गठन एक अध्यक्ष तथा तीन अन्य सदस्यों से मिलकर होता है।  अंकेक्षण समिति का अध्यक्ष एक स्वतंत्र संचालक होता है। 3.प्रकटीकरण:- कंपनी द्वारा अपनी महत्वपूर्ण सूचनाओं का प्रकटीकरण समय-समय पर किया जाना चाहिए। For example :- financial result, share holder pattern, corporate governance report

निगमीय प्रशासन

 Q.निगमीय प्रशासन से क्या आशय है? निगमीय प्रशासन के विभिन्न सिद्धांतों का वर्णन कीजिए। Answer:- निगमीय प्रशासन का अर्थ निगमीय प्रशासन को अंग्रेजी में corporate governance कहते हैं।  साधारण शब्दों में," निगमीय प्रशासन से आशय ऐसी प्रणाली से है जिसके द्वारा किसी कंपनी का संचालन तथा नियंत्रण जाता है। निगमीय प्रशासन का प्रमुख उद्देश्य कंपनी के हितधारकों(stakeholders) के हितों की रक्षा करना होता है। For example:- शेयरधारक(shareholders), प्रबंधक(manager), कर्मचारी(employees), ग्राहक(customer) आदि। निगमीय प्रशासन की विशेषताएं  निगमीय प्रशासन की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं । 1.पारदर्शिता (Transparency):-निगमीय प्रशासन की पहली तथा सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि जिसके अन्तर्गत कंपनी के कार्यों में पारदर्शिता बनी रहती है। क्योंकि इसके अंतर्गत कंपनी के कार्यों तथा उसकी नीतियों की जानकारी कंपनी के हित धारकों को स्पष्ट रूप से दी जाती है। For example :- समय पर annual report file करना 2.जवाबदेही (Accountability):-निगमीय प्रशासन की दूसरी तथा सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके अन्त...

The Competition Act, 2002

प्रस्तावना  Introduction  प्रतिस्पर्धा अधिनियम का पूरा नाम प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 है जिसे MRTP अधिनियम 1969 के स्थान पर लाया गया है । जो कि कि 13 जनवरी 2003 से जम्मू कश्मीर को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में लागू होता था लेकिन वर्तमान समय में संपूर्ण भारत में लागू होता है।इस अधिनियम का प्रमुख उदश्य बाजार में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना है। लेकिन इस अधिनियम के अन्तर्गत प्रतियोगिता विरोधी समझौते आदि पर रोक लगाई गई है। परिभाषाएं  Definitions प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 में दी गई प्रमुख परिभाषाएं निम्नलिखित हैं। कार्टेल:- कार्टेल को अंग्रेजी में cartel कहते हैं।  कार्टेल से आशय व्यवसाय से संबंध रखने वाले ऐसे संघ से है जिसके अन्तर्गत निर्माता तथा वितरणकर्ता आदि को सम्मिलित किया जाता है उपभोक्ता :- उपभोक्ता को अंग्रेजी में consumer  कहते हैं ‌। उपभोक्ता से आशय ऐसे व्यक्ति से है जो कि किसी प्रतिफल के वदले किसी वस्तु को खरीदता है। गुटबन्दी:- गुटबन्दी को अंग्रेजी में combination कहते हैं। जिसके अंतर्गत merger , acquisition and amalgamation को सम्मिलित किया जाता है।  लेकिन...

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता 2016

 Q.दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता 2016 के नियामक ढांचे को स्पष्ट कीजिए। Answer:-दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता 2016 के नियामक ढांचे के प्रमुख स्तंभ निम्नलिखित हैं। 1.भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड :-भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड को  अंग्रेजी में insolvency and bankruptcy board of India कहते हैं। जिसकी स्थापना 1 अक्टूबर 2016 को हुई थी और इसका मुख्य कार्यालय नई दिल्ली में स्थित है।  संरचना  IBBI में कुल 10 सदस्य होते हैं: एक अध्यक्ष (Chairperson) चार अंशकालिक सदस्य (Part-time members) तीन पूर्णकालिक सदस्य (Whole-time members) इनमें से दो सदस्य केंद्र सरकार(CG )द्वारा नामित किए जाते हैं। एक सदस्य भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा नामित किया जाता है। नियुक्ति भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI)के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। योग्यता  भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड के अध्यक्ष और अन्य सदस्य नियुक्त होने के लिए व्यक्ति के पास accounts ,finance, law तथा economics का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। वेतन भारतीय दिवाला...

दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016

 Ques 1: दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016 के अन्तर्गत  व्यक्तियो एवं व्याझेदारी फर्मो  के सम्बन्ध मे नवीन आरम्भ प्रक्रिया के महत्वपूर्ण प्रावधानो की विवेचना कीजिए।  Ans :-दिवालिया का अर्थ  साधारण शब्दों में,"दिवालिया से आशय ऐसे व्यक्ति से है जिसके दायित्व उसकी सम्पत्तियों से अधिक हो जाएं। लेकिन वैधानिक दृष्टि से किसी भी व्यक्ति को दिवालिया तब तक नहीं कहा जा सकता जब तक वह निम्नलिखित दो शर्तों को पूरा न करता हो।  1. उसके दायित्व उसकी सम्पत्तियों से अधिक हो जाएं।  2. न्यायालय द्वारा उसे दिवालिया घोषित कर दिया गया हो।  दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016 दिवाला एवं शोधन अक्षमता सहिता को Insolvency and Bankrupcy Code 2016 नाम से भी जाना जाता है। जिसे संक्षेप मे IBC 2016 भी कहते है, जोकि 5 मई 2016 लोकसभा में पास हुआ तथा 28 मई 2016 से सम्पूर्ण भारत मे लागू होता है।  दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016 का प्रमुख उद्देश्य दीवाला संबंधी कानूनों का एकीकरण करना एवं दीवाला संबंधी प्रक्रिया को आसान बनाना है। परिभाषायें Definitions दिवाला एवं शोधन अक्षमत...

धन विधेयक

 Q.धन-विधेयक को पास (पारित) करने की प्रक्रिया को समझाइये। Answer:- धन विधेयक का अर्थ धन-विधेयक से आशय ऐसे विधेयक से है जो कि कर लगाने, कर हटाने तथा भारत की संचित निधि से धन निकालने के लिए पारित किया जाता है।  धन विधेयक पारित करने की प्रक्रिया धन विधेयक पहले केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है राज्यसभा में नहीं । धन विधेयक राष्ट्रपति की सहमति के बिना लोकसभा में भी पेश नहीं किया जा सकता है। धन विधेयक लोकसभा द्वारा पारित किए जाने के पश्चात राज्यसभा को उसकी सिफारिश के लिए भेजा जाता है। राज्यसभा को अपनी सिफारिश के साथ धन विधेयक को 14 दिनों के भीतर लोकसभा को वापस कर देना चाहिए लेकिन यदि राज्यसभा 14 दिनों के भीतर धन विधेयक को वापस नहीं करती है तो उसे दशा में यह माना जाता है कि राज्यसभा ने भी धन विधेयक को पारित कर दिया है। धन विधेयक और वित्तीय विधेयक में अंतर प्रत्येक धन विधेयक वित्त विधेयक होता है किंतु प्रत्येक वित्त विधेयक धन विधेयक नहीं होता है।  धन विधेयक और वित्तीय विधेयक में दो बातें समान हैं। पहला यह है कि वित्त विधेयक भी धन विधेयक की भांति पहले केवल लोकसभा में ही पेश ...

माल एवं सेवा कर :आधारभूत जानकारी

 Q.जी० एस०टी से पहले अप्रत्यक्ष कर संरचना क्या थी उसकी कमियों के सम्बन्ध में जीएसटी की आवश्यकता को सिद्ध कीजिए।  जीएसटी से पहले अप्रत्यक्ष करों का संवैधानिक ढांचा Constitutional framework of indirect taxes before GST  जीएसटी एक एकीकृत कर है जिसमें केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार दोनों को कर लगाने एवं उसे एकत्रित करने का अधिकार प्राप्त है । लेकिन सन 2016 से पहले ऐसी व्यवस्था नहीं थी जिसे ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान संशोधन अधिनियम 2016 लेकर के आया गया जिसमें निम्नलिखित प्रावधान किए गए। 1. भारतीय संविधान संशोधन अधिनियम 2016 द्वारा संसद एवं राज्य विधान मंडल को कानून बनाने का अधिकार दिया गया कि संसद एवं राज्य विधान मंडल माल एवं सेवा कर‌ के संबंध में कानून बना सकते हैं। 2. भारतीय संविधान संशोधन अधिनियम 2016 द्वारा भारत सरकार को कर लगाने एवं एकत्रित करने का अधिकार दिया गया जिसका बंटवारा केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार के मध्य उसे तरीके से किया जाएगा जो तरीका जीएसटी काउंसिल की सिफारिश पर संसद कानून बनाकर निर्धारित करें। 3. भारतीय संविधान संशोधन अधिनियम 2016 द्वारा यह व्यवस्था की ...

सीमा शुल्क कानून (custom law)

 Q.सीमा शुल्क' से आप क्या समझते हैं? वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद भारत में लगाए जाने वाले सीमा शुल्क के विभिन्न प्रकारों को संक्षेप में समझाइए। Answer:- सीमा शुल्क का अर्थ  Meaning of custom duty  सीमा शुल्क को अंग्रेजी में ‌custom duty  कहते हैं।  सीमा शुल्क एक ऐसा अप्रत्यक्ष कर है। जो कि आयात अथवा निर्यात अथवा दोनों पर केंद्र सरकार द्वारा लगाया जाता है। यहां आयात से आशय किसी दूसरे देश से माल क्रय करने से है। तथा निर्यात से आशय  किसी दूसरे देश को माल का विक्रय करने से है। जब कोई देश किसी अन्य देश से माल  क्रय करता है तो इसे आयात कहते हैं और इस पर सरकार द्वारा आयात शुल्क अर्थात import  duty वसूली जाती है। जब कोई देश किसी अन्य देश को माल का विक्रय करता है तो इसे निर्यात कहते हैं और इस पर सरकार द्वारा निर्यात शुल्क अर्थात export  duty वसूली जाती है। आयात शुल्क तथा निर्यात शुल्क को सम्मिलित रूप से सीमा शुल्क कहते हैं सीमा शुल्क की विशेषताएं  Characteristics of custom duty 1.सीमा शुल्क एक अप्रत्यक्ष कर है  2.सीमा शुल्क के...

विपरीत प्रभार तंत्र (reverse charge mechanism)

 Q.रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म के अन्तर्गत आपूर्ति के समय को निर्धारित कीजिये। Answer:-  विपरीत प्रभार तंत्र का अर्थ  Meaning of reverse charge mechanism सामान्यतः कर का भुगतान आपूर्तिकर्ता (supplier)  किया जाता है, न कि प्राप्तकर्ता (recipient) द्वारा द्वारा।  लेकिन रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म (Reverse Charge Mechanism - RCM) के अंतर्गत, कर का भुगतान प्राप्तकर्ता (recipient) द्वारा किया जाता है, न कि आपूर्तिकर्ता (supplier) द्वारा।  यहां आपूर्तिकर्ता से आशा ऐसे व्यक्ति से है जो कि किसी वस्तु या सेवा का विक्रय करता है । तथा प्राप्तकर्ता से आशय ऐसे व्यक्ति से है जो कि किसी वस्तु या सेवा को क्रय करता है। For example:- A जी.एस.टी. के अन्तर्गत पंजीकृत नहीं है, क्योंकि उसका आवर्त निश्चित राशि से कम है। B यदि A से कोई माल क्रय करता है तो उस दशा में में B विपरीत प्रभार के अन्तर्गत कर का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा। विपरीत प्रभार के प्रभाव  विपरीत प्रभार के प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं। 1.यदि कोई रजिस्टर्ड डीलर किसी भी अनरजिस्टर्ड डीलर से माल या सेवा प्राप्त करता ...

कम्पोजीशन योजना(composition scheme)

 Q.GST की सामान्य योजना और कम्पोजीशन योजना में क्या अंतर है तथा कम्पोजीशन योजना की लाभ व हानिओं को संक्षेप में समझाइये। कम्पोजीशन योजना का अर्थ  कम्पोजीशन योजना को अंग्रेजी में composition scheme कहते हैं।  साधारण शब्दों में," कंपोजीशन योजना से आशय ऐसी ऐच्छिक योजना से है जो कि लघु एवं मध्यम स्तर के व्यापारियों के लिए लाई गई है । इसका प्रमुख उद्देश्य लघु एवं मध्यम स्तर के व्यापारियों के लिए कर की भुगतान प्रक्रिया को आसान बनाना है। इस योजना का लाभ केवल वही करदाता ले सकते हैं जिसका कुल आवर्त सामान्य राज्य की दशा में अधिकतम 1.5 करोड़ रुपए तथा विशिष्ट राज्यों की दशा में अधिकतम 75 लख रुपए है। क्योंकि यदि कोई व्यक्ति इस योजना को अपनाता है तो उस दशा में उसे प्रतिमाह सामान्य दर से कर का भुगतान करने की वजाय हर तिमाही एक निश्चित प्रतिशत कर के रूप में जमा करना पड़ता है जो कि कुल आवर्त का 1% अथवा 5% हो सकता है।  कम्पोजीशन योजना की विशेषताएं कम्पोजीशन योजना की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित है। 1. ऐच्छिक योजना:-कम्पोजीशन योजना की पहली तथा सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह एक ...

fundamental duties

 Q.State the fundamental duties of Indian citizens, which are mentioned in the Indian Constitution.  Initially, the Constitution did not mention fundamental duties, leading to criticism that it only addressed rights but not duties. To address this criticism, the 42nd Amendment to the Constitution was made in 1976, which outlined the following fundamental duties:  1. Every citizen has a duty to abide by the Constitution and  2.Every citizen has a duty to respect the national flag and national anthem.  3. Every citizen has a duty To protect the sovereignty, unity, and integrity of India.  4. Every citizen has a duty To defend the country.  5. Every citizen has a duty To value India's culture.  6. Every citizen has a duty To protect the environment.  7. To develop the scientific temper, humanism and the spirit of inquiry and reform.  8. Every citizen has a duty To safeguard public property . 9. Parents are expected to provide education opp...

डिजिटल मार्केटिंग

 डिजिटल मार्केटिंग का अर्थ  डिजिटल मार्केटिंग शब्द का पहली बार प्रयोग 1990 में फ्लिप कोटलर द्वारा किया गया था, इसलिए उन्हें डिजिटल मार्केटिंग का जनक कहा जाता है।  डिजिटल मार्केटिंग को ऑनलाइन मार्केटिंग, इंटरनेट मार्केटिंग, वेब मार्केटिंग और ई-मार्केटिंग के नाम से भी जाना जाता है।  सरल शब्दों में डिजिटल मार्केटिंग का अर्थ है उपभोक्ताओं तक पहुंचने के लिए इंटरनेट और मोबाइल का उपयोग करना।  डिजिटल मार्केटिंग का क्षेत्र  डिजिटल मार्केटिंग का दायरा दिन-ब-दिन गति और दक्षता के कारण बढ़ता जा रहा है।  डिजिटल मार्केटिंग के दायरे में शामिल हैं:  • ईमेल मार्केटिंग: ईमेल मार्केटिंग मार्केटिंग का एक रूप है जिसमें ईमेल का उपयोग करके लोगों के समूह को वाणिज्यिक संदेश भेजा जाता है।  • सर्च इंजन मार्केटिंग: सर्च इंजन मार्केटिंग मार्केटिंग का एक रूप है जिसमें वेबसाइट को सर्च इंजन परिणाम पृष्ठों में उसकी दृश्यता बढ़ाकर प्रचारित किया जाता है।  • वायरल मार्केटिंग: वायरल मार्केटिंग मार्केटिंग का एक रूप है जिसमें कंपनी के सामान या सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक रूप से एक...

ख्याति का मूल्यांकन

 Q.ख्याति की परिभाषा दीजिये। इसके मूल्यांकन की विभिन्न पद्धतियों का व्याख्या कीजिये । ख्याति का अर्थ  साधारण शब्दों में किसी भी व्यापारी की अतिरिक्त लाभ कमाने की क्षमता को ख्याति कहते हैं। ख्याति एक अचल तथा अमूर्त संपत्ति है। ख्याति की विशेषताएं  ख्याति की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं। 1.अमूर्त संपत्ति  - ख्याति अमूर्त संपत्ति है ना कि मूर्त संपत्ति। मूर्त संपत्ति से आशय से ऐसी संपत्ति से है जिसे देखा तथा छुआ जा सकता है। For example:- land ,building, machinery furniture ,motorcycle अमूर्त संपत्ति से आशय ऐसी संपत्ति से है जिसे देखा तथा छुआ नहीं जा सकता है। For example:-Goodwill, copyright, patent, trademark etc. 2.उतार चढ़ाव:-ख्याति के मूल्य में निरंतर उतार चढ़ाव होता है अर्थात् इसका मूल्य स्थिर नहीं रहता है। ख्याति के मूल्य को प्रभावित करने वाले तत्व /घटक ख्याति के मूल्य को प्रभावित करने वाली प्रमुख घटक निम्नलिखित है। 1.व्यवसाय की प्रकृति :- व्यवसाय की प्रकृति ख्याति के मूल्य को प्रभावित करने पहला तथा सबसे महत्वपूर्ण घटक है ।क्योंकि जिस व्यवसाय में जितनी अच्छी किस...

साझेदारी फर्म का‌ समापन

 Q.साझेदारी फर्म के विघटन के कौन-कौन से तरीके हैं? विघटन के क्या परिणाम होते हैं? Answer:- साझेदारी के विघटन/समापन/समाप्ति का अर्थ  साधारण शब्दों में" साझेदारी के समापन से आशय साझेदारी फर्म के समापन से लगाया जाता है जबकि ऐसा आवश्यक नहीं है कि यदि साझेदारी का विघटन हो रहा है तो उस दशा में साझेदारी फर्म का विघटन भी हो जाए। क्योंकि साझेदारी का विघटन और साझेदारी फर्म का विघटन दोनों अलग-अलग है। क्योंकि जब भी कोई नया साझेदार प्रवेश करता है अथवा जब भी कोई पुराना साझेदारी अवकाश ग्रहण करता है अथवा किसी साझेदार की मृत्यु हो जाती है तो उस दशा में पुरानी साझेदारी का विघटन हो जाता है और नई साझेदारी की स्थापना होती है। साझेदारी फर्म के विघटन/समापन/समाप्ति का अर्थ  साझेदारी फर्म के समापन से आशय ऐसी वैधानिक कार्यवाही से है। जिसके द्वारा किसी भी फर्म के व्यवसाय को वन्द कर दिया जाता है। और उसकी सम्पत्तियों को बेचकर जो भी धन प्राप्त होता है। उससे सर्वप्रथम कम्पनी के लेनदारों/ऋण दाताओं का भुगतान किया जाता है। और इसके बाद भी यदि कुछ धन शेष बचता है, तो उसे साझेदारों में वांट दिया जाता है।...

भागीदार के विवक्षित प्राधिकार (implied authority of partner)

 Q.भागीदार का फर्म के अभिकर्ता होने के नाते क्या विवक्षित अधिकार होता है ? विवेचना कीजिये। भागीदार के विवक्षित प्राधिकार पर क्या प्रतिबंध हो सकते हैं ? साझेदारों के अधिकार कर्तव्य एवं दायित्व  साझेदारों के अधिकार कर्तव्य एवं दायित्व साझेदारी संलेख द्वारा निर्धारित होते हैं लेकिन साझेदारी संलेख के अभाव में साझेदारों के अधिकार कर्तव्य एवं दायित्व साझेदारी अधिनियम 1932 द्वारा निर्धारित होते हैं। साझेदारों के अधिकार  साझेदारी संलेख के अभाव में साझेदारों के प्रमुख अधिकार निम्नलिखित हैं। 1.व्यापार के संचालन में भाग लेने का अधिकार :- साझेदारी संलेख के अभाव में प्रत्येक साझेदारी को व्यापार के संचालन में भाग लेने का अधिकार होता है।  2.मत देने का अधिकार:-साझेदारी संलेख के अभाव में प्रत्येक साझेदारी को मत देने का अधिकार होता है।  3.लाभ हानि में समान भाग पाने का अधिकार :-साझेदारी संलेख के अभाव में प्रत्येक साझेदार को लाभ हानि में समान भाग पाने का अधिकार होता है। 4.पूंजी पर ब्याज पाने का अधिकार :-साझेदारी संलेख के अभाव में पूंजी पर ब्याज पाने का अधिकार नहीं होता है...

अवयस्क साझेदार

 Q.क्या नाबालिग/अवयस्क को साझेदारी में शामिल किया जा सकता है एक फर्म में सम्मिलित अवयस्क के अधिकार एवं उत्तरदायित्वों का उल्लेख कीजिए। Answer: अवयस्क साझेदार का अर्थ अवयस्क साझेदार को अंग्रेजी में minor partner कहते हैं जिसे नाबालिग साझेदार के नाम से भी जाना जाता है। अवयस्क साझेदार से आशय ऐसे साझेदार से है जिसकी उम्र 18 वर्ष से कम है। क्या अवयस्क साझेदार हो सकता है ? भारत की साझेदारी अधिनियम 1932 के अनुसार एक अवयस्क साझेदार नहीं हो सकता लेकिन अन्य सभी साझेदारों की पूर्व सहमति से उसे फर्म के लाभों में सम्मिलित किया जा सकता है । क्योंकि भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872 के अनुसार अवयस्क के साथ किया गया अनुबंध व्यर्थ होता है ।क्योंकि कोई भी अवयस्क व्यक्ति अनुबंध करने की क्षमता नहीं रखता है। अवयस्क साझेदार के अधिकार  भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 द्वारा अवयस्क साझेदार को निम्नलिखित अधिकार प्रदान किए गए हैं 1.फर्म के लाभ में हिस्सा पाने का अधिकार:-भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 द्वारा अवयस्क साझेदार को फर्म के लाभ में हिस्सा पाने का अधिकार प्रदान किया गया है। 2.फर्म की संपत्ति में हिस्सा पान...

साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन

 Q.एक फर्म के पंजीकरण की प्रक्रिया बताइए। एक फर्म पंजीकरण न होने के परिणाम बताइए। साझेदारी फर्म के रजिस्ट्रेशन/पंजीयन/ पंजीकरण का अर्थ  Meaning of registration of partnership firm साझेदारी फर्म के रजिस्ट्रेशन से आशय  सम्बन्धित राज्य के रजिस्टर ऑफ कॉमर्स के रजिस्टर में फर्म के नाम की entry करा कर रजिस्ट्रेशन का प्रमाण पत्र प्राप्त करने से है । ध्यान देने योग्य बाद यह है कि साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन फर्म का रजिस्ट्रार करता है। साझेदारी फर्म के रजिस्ट्रेशन की विधि / प्रक्रिया  Procedure of registration of partnership firm साझेदारी फर्म के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को निम्नलिखित चरणों में विभक्त किया जा सकता है। 1. साझेदारी फर्म के नाम का चयन: यह साझेदारी फर्म के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया का पहला तथा सबसे महत्वपूर्ण चरण है जिसके अंतर्गत साझेदारी फर्म का चयन किया जाता है। ध्यान देने योग्य बात यह है की साझेदारी फर्म के नाम का चयन करते समय किंग तथा क्वीन जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। 2. साझेदारी संलेख तैयार करना: यह साझेदारी फर्म के रजिस्ट्रेशन करने की प्रक्रिया क...