साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन

 Q.एक फर्म के पंजीकरण की प्रक्रिया बताइए। एक फर्म पंजीकरण न होने के परिणाम बताइए।


साझेदारी फर्म के रजिस्ट्रेशन/पंजीयन/ पंजीकरण का अर्थ 
Meaning of registration of partnership firm


साझेदारी फर्म के रजिस्ट्रेशन से आशय  सम्बन्धित राज्य के रजिस्टर ऑफ कॉमर्स के रजिस्टर में फर्म के नाम की entry करा कर रजिस्ट्रेशन का प्रमाण पत्र प्राप्त करने से है ।

ध्यान देने योग्य बाद यह है कि साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन फर्म का रजिस्ट्रार करता है।


साझेदारी फर्म के रजिस्ट्रेशन की विधि / प्रक्रिया 
Procedure of registration of partnership firm

साझेदारी फर्म के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को निम्नलिखित चरणों में विभक्त किया जा सकता है।


1. साझेदारी फर्म के नाम का चयन: यह साझेदारी फर्म के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया का पहला तथा सबसे महत्वपूर्ण चरण है जिसके अंतर्गत साझेदारी फर्म का चयन किया जाता है।

ध्यान देने योग्य बात यह है की साझेदारी फर्म के नाम का चयन करते समय किंग तथा क्वीन जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।



2. साझेदारी संलेख तैयार करना: यह साझेदारी फर्म के रजिस्ट्रेशन करने की प्रक्रिया का दूसरा तथा सबसे महत्वपूर्ण चरण है जिसके अंतर्गत साझेदारी संलेख तैयार किया जाता है जिसमें साझेदारी से संबंधित सभी महत्वपूर्ण शर्तों का उल्लेख होता है।


3. फॉर्म भरना: यह साझेदारी फर्म के रजिस्ट्रेशन करने की प्रक्रिया का तीसरा तथा सबसे महत्वपूर्ण चरण है जिसके अंतर्गत निर्धारित प्रारूप में फॉर्म भरा जाता है और उसे रजिस्ट्रार ऑफ कॉमर्स के कार्यालय में जमा किया जाता है।


4. रजिस्ट्रेशन का प्रमाण पत्र प्रदान करना: यह साझेदारी फर्म के रजिस्ट्रेशन करने की प्रक्रिया का चौथा तथा सबसे महत्वपूर्ण चरण है जिसके अंतर्गत यदि रजिस्ट्रार ऑफ फॉर्म आवेदक द्वारा दिए गए आवेदन से संतुष्ट होता है तो उस दशा में वह आवेदक को रजिस्ट्रेशन का प्रमाण पत्र प्रदान कर देता है।


साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन कराने के लाभ 
Advantages of registration of partnership firm


साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन कराने के प्रमुख लाभ निम्नलिखित है।


1. फर्म द्वारा साझेदार के विरुद्ध वाद प्रस्तुत किया जाना: साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन करने का पहला तथा सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इससे फर्म को अन्य पक्षों के विरुद्ध वाद प्रस्तुत करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है


2. साझेदार द्वारा फर्म के विरुद्ध वाद प्रस्तुत किया जाना: साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन करने का दूसरा तथा सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इससे किसी भी साझेदार द्वारा फर्म के विरुद्ध वाद प्रस्तुत किया जा सकता है।


साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन न कराने के दोष
Disadvantages of non registration of partnership firm 


भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 के अनुसार किसी भी साझेदारी फर्म को पंजीयन या रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य नहीं है बल्कि ऐच्छिक है।

साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन न कराने के प्रमुख दोष निम्नलिखित है


1.फर्म द्वारा साझेदार के विरुद्ध वाद प्रस्तुत न किया जाना: साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन न करने का पहला तथा सबसे महत्वपूर्ण दोष यह है कि इससे फर्म को अन्य पक्षों के विरुद्ध वाद प्रस्तुत करने का अधिकार प्राप्त नहीं होता है।


2. साझेदार द्वारा फर्म के विरुद्ध वाद प्रस्तुत न किया जाना: : साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन न करने का दूसरा तथा सबसे महत्वपूर्ण दोष यह है कि इससे किसी भी साझेदार द्वारा फर्म के विरुद्ध वाद प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है।


साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन न कराने से प्रभावित न होने वाले अधिकार
Rights which are not affected due to non registration of partnership firm


साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन न कराने से प्रभावित न होने वाले प्रमुख अधिकार निम्नलिखित हैं।


1.अन्य पक्षों द्वारा फर्म के विरुद्ध वाद प्रस्तुत किया जाना: साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन न कराने से अन्य पक्षों द्वारा फर्म के विरुद्ध वाद प्रस्तुत किया जा सकता है। 


2. मध्यस्थता की कार्यवाही: साझेदारी फर्म का रजिस्ट्रेशन न कराने से मध्यस्थता की कार्यवाही किया जा सकता है। 

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