स्त्रियों की दशा
Q.मध्यकालीन भारत में स्त्रियों की दशा पर टिप्पणी लिखिये।
मध्यकालीन भारत में स्त्रियों की दशा
मध्यकालीन भारत (लगभग 8वीं से 18वीं शताब्दी) में स्त्रियों की स्थिति समाज, धर्म, वर्ग और क्षेत्र के अनुसार भिन्न-भिन्न थी। सामान्यतः इस काल में स्त्रियों की सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर मानी जाती है, फिर भी कुछ सकारात्मक पहलू भी दिखाई देते हैं।
1. सामाजिक स्थिति :- इस काल में बाल विवाह, पर्दा प्रथा (परदा/जेनाना), सती प्रथा और बहुविवाह जैसी कुप्रथाएँ प्रचलित थीं। विधवाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी और उन्हें पुनर्विवाह की अनुमति प्रायः नहीं थी। स्त्रियों को परिवार और समाज में पुरुषों पर आश्रित माना जाता था।
2. शैक्षिक स्थिति :- स्त्रियों की शिक्षा सीमित थी। उच्च वर्ग या राजपरिवार की कुछ स्त्रियाँ ही शिक्षा प्राप्त कर पाती थीं। सामान्य स्त्रियों को औपचारिक शिक्षा से वंचित रखा गया। धार्मिक ग्रंथों और साहित्य के अध्ययन का अधिकार भी बहुत कम था।
3. आर्थिक स्थिति:- स्त्रियाँ घरेलू कार्यों तक सीमित थीं। संपत्ति पर उनका अधिकार बहुत सीमित था। कुछ क्षेत्रों में स्त्रियाँ कृषि, हस्तशिल्प और घरेलू उद्योगों में योगदान देती थीं, परंतु उन्हें स्वतंत्र आर्थिक पहचान नहीं मिलती थी।
4. राजनीतिक भूमिका:- इस दौरान स्त्रियों की राजनीतिक भागीदारी नगण्य थी, फिर भी रज़िया सुल्तान, चाँद बीबी जैसी स्त्रियाँ अपवाद के रूप में शासन और युद्ध में सक्रिय रहीं।
5. धार्मिक एवं सांस्कृतिक योगदान:- भक्ति आंदोलन के अंतर्गत मीराबाई जैसी स्त्रियों ने धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर मध्यकालीन भारत में स्त्रियों की स्थिति अधिकांशतः दयनीय और सीमित थी, परंतु कुछ स्त्रियों ने सामाजिक बंधनों को तोड़कर शिक्षा, राजनीति और धर्म के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। यह काल स्त्रियों के संघर्ष और सीमित अवसरों का युग माना जा सकता है।
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