काकोरी काण्ड और लाहौर काण्ड
यह मामला लखनऊ के पास काकोरी नामक स्थान पर गठित हुआ। जिसके अन्तर्गत लखनऊ जाने वाली मालगाड़ी में रखे सरकारी खजाने को लूट लिया गया।
इस मामले में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, रोशन लाल तथा राजेन्द्र लाहिड़ी को फांसी दे दी गई।
काकोरी काण्ड में 'हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन' के अधिकांश नेता भी गिरफ्तार कर लिए गए जिसके बाद इस संगठन का अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' की स्थापना सन् 1924 ई० में कानपुर में की गई थी। तथा बिहार, उ०प्र०, दिल्ली, पंजाब, मद्रास ,बंगाल आदि प्रान्तों में इसकी शाखाएँ थीं।
इसके प्रमुख विचार निम्नलिखित थे—
1.भारतीय जनता को यह समझना कि केवल Mahatma Gandhi की अहिंसावादी नीतियों से स्वतंत्रता प्राप्त करना कठिन है।
2.पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए प्रत्यक्ष कार्यवाही तथा क्रान्ति की आवश्यकता का प्रदर्शन करना।
कुछ समय पश्चात् इस काण्ड के एक मात्र बचे क्रांतिकारी सदस्य चन्द्रशेखर आजाद ने दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में एक बैठक की और यहीं पर 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' की स्थापना की।
'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' का पहला कार्य लाहौर के सहायक पुलिस अधीक्षक(ASP )'साण्डर्स' की हत्या करना था। यह हत्या 30 अक्टूबर, 1928 को साइमन कमीशन के विरोध के कारण, लाला लाजपत राय की पुलिस द्वारा की गई पिटाई के कारण हुई थी। साण्डर्स की हत्या में भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद और राजगुरु शामिल थे।
इस घटना को लाहौर काण्ड के नाम से भी जाना जाता है।
साण्डर्स की हत्या के बाद क्रांतिकारी तो भूमिगत(underground )हो गए थे। परन्तु ब्रिटिश पुलिस निर्दोष अथवा सामान्य जनता को परेशान करने लगी। इसीलिए पुलिस का अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए भगतसिंह एवं बटुकेश्वर दत्त ने सेण्ट्रल असेम्बली में बम फेंका। बम के साथ असेम्बली में कुछ पर्चे भी फेंके गए जिस पर लिखा था— "बहरों को सुनाने के लिए बमों की आवश्यकता है।" जिसे ध्यान में रखते हुए इन दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया तथा इन पर मुकदमा चलाया गया।
भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त की गिरफ्तारी के साथ ही अन्य अनेक क्रांतिकारी गिरफ्तार किए गए और उन पर लाहौर षड्यंत्र काण्ड में संयुक्त रूप से मुकदमा चलाया गया।
जेल में बन्द इन क्रांतिकारियों ने राजनीतिक बन्दियों का दर्जा प्राप्त करने के लिए भूख हड़ताल प्रारम्भ कर दी। इनमें 'जतिन दास' भी शामिल थे। हड़ताल के 64वें दिन जतिन दास का देहान्त हो गया।
लाहौर काण्ड में अधिकांश क्रांतिकारियों को दोषी पाया गया और उनमें से तीन भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को 23 मार्च, 1931 को लाहौर में फाँसी दे दी गई।
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