सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 (Cinematograph Act, 1952)
Q.सिनेमाटोग्राफ अधिनियम, 1952 पर एक निबंध लिखिए।
प्रस्तावना (Introduction)
सिनेमाटोग्राफ अधिनियम का पूरा नाम सिनेमाटोग्राफ अधिनियम, 1952 है जिसका प्रमुख उद्देश्य भारत में फिल्मों के प्रदर्शन और उनके प्रमाणन (Certification) को विनियमित करना है। इस अधिनियम से पहले फिल्मों पर नियंत्रण के नियम स्पष्ट नहीं थे, लेकिन इस कानून के आने के बाद फिल्मों को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए एक 'सर्टिफिकेट' लेना अनिवार्य हो गया है। इसका प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि फिल्मों का कंटेंट समाज, नैतिकता और देश की सुरक्षा के मानकों के अनुकूल हो।
परिभाषाएँ
सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 में दी गई प्रमुख परिभाषाएं निम्नलिखित हैं।
1.फिल्म (Film):- सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के अनुसार फिल्म से आशय किसी भी ऐसी सिनेमैटोग्राफ कृति से है जिसमें गतिमान चित्र (moving images) शामिल हों, चाहे वह रील पर हो या डिजिटल प्रारूप में।
2. बोर्ड (The Board):- सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के अनुसार बोर्ड से आशय केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) से है, जिसे सामान्य भाषा में 'सेंसर बोर्ड' के नाम से भी जाना जाता है। जिसका प्रमुख उद्देश्य फिल्मों को जांचना और उन्हें श्रेणी प्रदान करना है।
3. सार्वजनिक प्रदर्शन (Public Exhibition):सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के अनुसार सार्वजनिक प्रदर्शन से आशय किसी फिल्म को व्यावसायिक या गैर-व्यावसायिक उद्देश्य से आम जनता के लिए सिनेमा हॉल या अन्य स्थानों पर दिखाने से है।
फिल्मों के प्रमाणन की श्रेणियाँ (Categories of Certification)
सेंसर बोर्ड फिल्मों को उनकी विषय-वस्तु के आधार पर निम्नलिखित श्रेणियों में बांटता है:
1.'U' :-यह फिल्म सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए होती है।(Universal)।
2.'UA' :- यह फिल्म भी सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए होती है लेकिन यदि बच्चे की उम्र 12 वर्ष से कम है तो उसे ऐसी फिल्में अपने माता पिता के मार्ग दर्शन में देखनी चाहिए।
3.'A': -यह फिल्म केवल 18 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों के लिए होती है।जिसे वयस्क कहते हैं।
4.'S' :- यह फिल्म किसी विशेष वर्ग (जैसे डॉक्टर या वैज्ञानिक) के लिए होती है।
अधिनियम की आवश्यकता और उद्देश्य
सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं।
1. नैतिकता बनाए रखने के लिए:-सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 का पहला तथा सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य समाज में नैतिकता बनाए रखना है। अर्थात् फिल्म में कोई भी ऐसी सामग्री नहीं होनी चाहिए जो अश्लीलता या अनैतिकता को बढ़ावा दे।
2.देश की सुरक्षा और संप्रभुता:- सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 का दूसरा तथा सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य देश की सुरक्षा और संप्रभुता बनाए रखना है अर्थात् फिल्म में कोई भी ऐसी सामग्री नहीं होनी चाहिए
जो दूसरे देशों के साथ भारत के संबंधों या देश की अखंडता को नुकसान पहुँचाती हों।
3. अपराध को रोकना:- सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 का तीसरा तथा सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य अपराध को रोकना है।अर्थात् फिल्म में कोई भी ऐसी सामग्री नहीं होनी चाहिए जो जनता को अपराध करने के लिए उकसाती हो।
4. बाल संरक्षण:-सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 का चौथा तथा सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य बच्चों को संरक्षण प्रदान करना है अर्थात् फिल्म में कोई भी ऐसी सामग्री नहीं होनी चाहिए जिससे बच्चों के मानसिक विकास पर बुरा प्रभाव पड़े।
दंड
सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 में दिए गए दंड संबंधी प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं।
1.बिना सर्टिफिकेट के फिल्म दिखाना:-सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के अनुसार बिना CBFC सर्टिफिकेट के फिल्म दिखाना अवैध माना जाता है।
2.सेंसर बोर्ड के आदेश का उल्लंघन:-सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के अनुसार सेंसर बोर्ड के आदेश का उल्लंघन करना दंडनीय अपराध है।।
अर्थात्से यदि कोई व्यक्ति फिल्म से हटाए गए दृश्यों (Cuts) को फिर से जोड़कर दिखाता है तो यह एक दंडनीय अपराध है।
3.सजा:- सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति कोई अपराध करता है तो उस दशा में उसे जुर्माने और कारावास दोनों से दण्डित किया जा सकता है।
अपील
सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बोर्ड के निर्णय से संतुष्ट नहीं था, तो उस दशा में वह Film Certification Appellate Tribunal (FCAT) में अपील कर सकता था।
लेकिन 2021 में FCAT को समाप्त (abolish) कर दिया गया है।
इसलिए यदि कोई व्यक्ति बोर्ड के निर्णय से संतुष्ट नहीं है, तो उस दशा में वह सीधे उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है।
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