अपराध

 अपराध का अर्थ 


अपराध के कारणों को समझने से पूर्व में अपराध के अर्थ को संक्षेप में समझ लेना अत्यन्त आवश्यक है। 

सामान्य शब्दों में "अपराध एक अवैधानिक कृत्य तथा लोक दोष है। जिससे समाज को आघात पहुँचता है और विधि द्वारा दण्डनीय होता है।" 


अपराध के सामान्य तत्व 


यदि कोई व्यक्ति दुराशय से किसी ऐसे अपराधिक कृत्य को करता है जिससे समाज को आघात पहुँचता है, अपराध कहलाता है। 


अपराध के गठन के लिए निम्नलिखित चार तत्वों का होना आवश्यक है: 


1. मानव — किसी भी अपराध के गठन के लिए कम से कम एक व्यक्ति का होना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि प्राचीनकाल में पशु तथा निर्जीव वस्तुओं को दण्ड दिये जाने के उदाहरण भी मिलते हैं। 

For Exp:- 

• गधे के खेत में पाये जाने पर उसके कान काट देना। 

• बैल द्वारा सींघ मारने पर उसके सींघ तोड़कर उसके मालिक को दोष देना। 

• गाड़ी से मृत्यु होने पर उसे राज्य की सीमा के बाहर फेंक देना। 


2. दुराशय (Mens Rea):किसी भी व्यक्ति द्वारा किया गया कोई भी कार्य अपराध नहीं होगा यदि उसका मन अपराधी नहीं है क्योंकि अपराध विधि की एक सुविदित अवधारणा है — Actus non facit reum nisi mens sit rea. 

अर्थात्का मात्र किसी को अपराधी नहीं बनाता यदि उसका मन अपराधी न हो। 


For Exp: जब किसी व्यक्ति को मृत्यु की धमकी देकर उससे कोई अपराध कराया जाता है तो न तो कोई अपराधिक मन स्थिति है और न ही कोई अपराध होता है। 


3.अपराधिक कृत्य:- किसी व्यक्ति द्वारा अपराध करने के लिए दुराशय से अपराधिक कृत्य का किया जाना भी अत्यन्त आवश्यक है। 


4.समाज को क्षति:- अपराध के गठन के लिए व्यक्तियों समाज को क्षति का होना अत्यन्त आवश्यक है। लेकिन कुछ कठोर दायित्व के मामले ऐसे होते हैं। जिनमें क्षति का होना आवश्यक नहीं है। 

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अपराध के कारण

अपराध के कारण और बाल अपराध के कारण एक समान हैं। 



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