आर्य समाज/स्वामी दयानंद सरस्वती

 Q.आर्य समाज पर विस्तृत आलेख लिखिए 


Answer: प्रस्तावना 
Introduction 


आर्य समाज आधुनिक भारत का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार आंदोलन है। इसकी स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती  ने 10 अप्रैल 1875 को मुंबई में की थी। 

इस संस्था का प्रमुख उद्देश्य संसार का उपकार करना है


स्वामी दयानंद सरस्वती का परिचय


स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम करषणजी लालजी तिवारी और माता का नाम यशोदाबाई था। इनके बचपन का नाम  मूलशंकर था।


इन्होंने सत्य की खोज में कम उम्र में ही घर त्याग दिया और मथुरा के स्वामी विरजानंद को अपना गुरु बनाया। गुरु की प्रेरणा से इन्होंने वेदों के शुद्ध ज्ञान का प्रचार करने और समाज से अंधविश्वास मिटाने का संकल्प लिया।

इन्होंने प्रसिद्ध ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' की रचना की।



आर्य समाज की स्थापना


आर्य समाज की स्थापना 1875 में मुंबई में हुई थी लेकिन बाद में इसका मुख्यालय लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान) बनाया गया। 

इस संस्था का प्रमुख उद्देश्य संसार का उपकार करना है


आर्य समाज के सिद्धांत


आर्य समाज के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं।


1.समस्त सत्य, विद्या और पदार्थ आदि का मूल परमेश्वर है। इन सभी को विद्या के आधार पर जाना जाता है।


2.ईश्वर निराकार और सर्वशक्तिमान है। 


3.वेद ही सत्य और ज्ञान के स्रोत है; अतः वेदों का पढ़ना-पढ़ाना, सुनना-सुनाना प्रत्येक आर्य का परम धर्म एवं कर्त्तव्य है।


4.सदा सत्य को ग्रहण करने और असत्य को त्यागने के लिए तत्पर रहना चाहिए।


5.सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य का विचार करके करने चाहिए।


6.इस समाज का प्रमुख उद्देश्य संसार का उपकार करना है।


7.सबसे प्रेमपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य व्यवहार करना चाहिए।


8.विद्या की वृद्धि और अविद्या के नाश का सदैव प्रयत्न करते रहना चाहिए।



9.प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिए, वरन् सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।


10.सभी मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियमों का पालन निष्ठापूर्वक करना चाहिए।


आर्य समाज के कार्य


आर्य समाज के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं।


1.जाति-प्रथा का विरोध:-आर्य समाज का पहला तथा सबसे महत्वपूर्ण कार्य जाति-प्रथा का विरोध करना था।

जाति-प्रथा का अर्थ है समाज का जन्म के आधार पर अलग-अलग जातियों में बँट जाना और भेदभाव होना।


2.धर्म परिवर्तन को रोकना:-आर्य समाज का दूसरा तथा सबसे महत्वपूर्ण कार्य धर्म परिवर्तन को रोकना था।

अर्थात् इन्होंने देश के लाखों लोगों को धर्म परिवर्तन करने से बचा लिया।

और इसके लिए इन्होंने शुद्धि आंदोलन चलाया और जो लोग अन्य धर्मों में चले गए थे, उन्हें पुनः अपनी इच्छा से हिंदू धर्म में लौटने के लिए प्रेरित किया 



3.महिला शिक्षा और अधिकार को बढ़ावा देना:- आर्य समाज का तीसरा तथा सबसे महत्वपूर्ण कार्य महिला शिक्षा और अधिकार को बढ़ावा देना था।

अर्थात् इन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया और लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल खोले।

For example:- दयानंद एंग्लो-वैदिक (DAV) तथा गुरुकुल कांगड़ी आदि।


4.बाल-विवाह का विरोध:-आर्य समाज का चौथा तथा सबसे महत्वपूर्ण कार्य बाल-विवाह का विरोध करना था।

बाल-विवाह का अर्थ है बच्चों का बहुत कम उम्र में विवाह कर देना।


5.बहु-विवाह का विरोध:-आर्य समाज का पांचवा तथा सबसे महत्वपूर्ण कार्य बहु-विवाह का विरोध करना था।

बहु-विवाह का अर्थ है एक पुरुष का एक से अधिक पत्नियाँ रखना।

लेकिन इस दौरान लड़कियां लड़कों की तरह बहु विवाह नहीं कर सकती थीं


6.पर्दा-प्रथा का विरोध:-आर्य समाज का छठा तथा सबसे महत्वपूर्ण कार्य पर्दा-प्रथा का विरोध करना था।

पर्दा-प्रथा का अर्थ है महिलाओं का चेहरा और शरीर ढककर सार्वजनिक रूप से अलग रहना।


7.सती प्रथा का अंत:-आर्य समाज का सातवां तथा सबसे महत्वपूर्ण कार्य सती प्रथा का अंत करना था।

सती प्रथा वह प्रथा थी जिसमें पति की मृत्यु के  पश्चात उसकी पत्नी को जलकर मरने के लिए मजबूर किया जाता था।


8.विधवा-विवाह निषेध प्रथा का विरोध:-आर्य समाज का आठवां तथा सबसे महत्वपूर्ण कार्य विधवा-विवाह निषेध प्रथा का विरोध करना था।

विधवा-विवाह निषेध प्रथा का अर्थ है पति की मृत्यु के बाद विधवा स्त्री को पुनर्विवाह की अनुमति न देना।


9.हिंदी का प्रचार करना:- आर्य समाज का नौवां तथा सबसे महत्वपूर्ण कार्य हिंदी का प्रचार करना था।

जिसके लिए उन्होंने सत्यार्थप्रकाश नामक ग्रन्थ की भी रचना की।


निष्कर्ष (Conclusion)


निष्कर्षतः, आर्य समाज केवल एक धार्मिक संस्था नहीं, बल्कि एक बौद्धिक और सामाजिक क्रांति का नाम है। जिसने भारतीयों में आत्मविश्वास जगाया और उन्हें अपनी जड़ों (वेदों) की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया। आज भी यह संस्था अपनी शैक्षणिक संस्थाओं और यज्ञ-हवन के माध्यम से समाज में नैतिकता और अनुशासन का प्रसार कर रही है।

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