मृत्युदण्ड
Q. मृत्युदण्ड के पक्ष तथा विपक्ष में तर्क दीजिए ? क्या यह संवैधानिक है?
Answer: मृत्यु दण्ड के तरीके
मृत्यु दण्ड के विभिन्न तरीके निम्नलिखित हैं।
1.दम घोंटकर: इसमें अपराधी के शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति पूरी तरह बंद कर दी जाती थी, ताकि दम घुटने के कारण उसकी मौत हो जाए।
2.सूली पर टांगकर: जो व्यक्ति मासूम लोगों की बर्बरतापूर्ण ढंग से हत्या करता था, उसे सूली पर टांग कर मृत्युदण्ड दिया जाता था ताकि उसे यह अहसास हो कि जिस व्यक्ति को उसने यातना देकर मार डाला है, उसे कितना कष्ट हुआ होगा।
3.कुचलकर
4.तलवार या कुल्हाड़ी से सिर कलम
5.पत्थरों से प्रहार करके
भारतीय न्याय संहिता, 2023 में कुछ गंभीर अपराधों के लिए मृत्युदण्ड अथवा आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया है। ये अपराध निम्नलिखित हैं—
1.भारत की संप्रभुता, एकता और अखण्डता के विरुद्ध युद्ध छेड़ना — धारा 147
2.विद्रोह का दुष्प्रेरण, यदि उसके परिणामस्वरूप युद्ध किया जाए — धारा 160
3.मृत्युदण्ड से दण्डनीय अपराध के लिए मिथ्या साक्ष्य देना या गढ़ना — धारा 229
4.हत्या — धारा 103
5.बालक अथवा विक्षिप्त व्यक्ति को आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरित करना — धारा 107
6.आजीवन कारावास प्राप्त अपराधी द्वारा हत्या का प्रयास — धारा 109
7.हत्या सहित डकैती — धारा 310
8.फिरौती के लिए अपहरण — धारा 140
9.बलात्कार के कारण पीड़िता की मृत्यु अथवा लगातार वनस्पतिक अवस्था (Vegetative State) में पहुँचा देना — धारा 66
10.बारह वर्ष से कम आयु की बालिका के साथ सामूहिक बलात्कार — धारा 70(2)
11.बारह वर्ष से कम आयु की बालिका से बलात्कार — धारा 65
12.पाँच या अधिक व्यक्तियों द्वारा जाति, समुदाय, भाषा आदि के आधार पर सामूहिक हत्या (Mob Lynching) — धारा 103(2)
मृत्यदंड के पक्ष में तर्क
मृत्यदंड के पक्ष में प्रमुख तर्क निम्नलिखित हैं।
1.समाज की सुरक्षा: इससे समाज को सुरक्षित बनाया जाता है।
2.पुनरावृत्ति की संभावना समाप्त:- इससे अपराध होने के पुनरावृत्ति की संभावना समाप्त हो जाती है।
मृत्यु दण्ड के विपक्ष में तर्क
मृत्यु दण्ड के विपक्ष में प्रमुख तर्क निम्नलिखित हैं।
1.अपराध रोकने में पूर्णतः प्रभावी नहीं:- यह अपराध रोकने में पूर्णतः प्रभावी नहीं है।
2.प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन :इससे प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होता है।
क्या मृत्युदण्ड संवैधानिक है?
क्या मृत्युदण्ड संवैधानिक है ? यह समझने ने से पूर्व हमें निम्नलिखित वादों में न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय को समझ लेना अत्यन्त आवश्यक है।
किशोरी बनाम स्टेट ऑफ दिल्ली
इस मामले में न्यायालय ने यह कहा कि मृत्यु दण्ड 'विरले से विरले' (कम से कम) मामले में ही दिया जा सकता है।
जगमोहन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश
इस मामले में मृत्यु दण्ड को असंवैधानिक कहते हुए इसकी मान्यता को चुनौती दी गयी थी। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने मृत्यु दण्ड को उचित ठहराया।
राजेन्द्र प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश
इस मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा मृत्यु दंड को असंवैधानिक घोषित किया गया था।
बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य
इस विषय पर यह अन्तिम तथा सबसे महत्वपूर्ण मामला है।इस मामले में न्यायालय ने यह कहा कि मृत्यु दंड "बिरले से बिरले" (Rarest of Rare) मामले में ही दिया जाना चाहिए। तथा इसका निर्णय लेते समय निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार किया जाना चाहिए:
(i) यदि हत्या पूर्व नियोजन के फलस्वरूप क्रूरतापूर्वक की गई हो।
(ii) यदि हत्या घोर अनैतिकता पूर्वक की गई हो। (जैसे: आर्थिक लाभ के लिए)
(iii) यदि लोक सेवक (Police, सरकारी कर्मचारी या भारतीय सेना के किसी सदस्य) की हत्या की गई हो।
निष्कर्ष :- अतः निष्कर्ष के रूप में हम यह कह सकते हैं कि मृत्यु दण्ड संवैधानिक है।
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